सरकारी संस्थाओं के निजीकरण के मुद्दे पर आजकल खूब चर्चा हो रही है

Post Date: August 25, 2020

सरकारी संस्थाओं के निजीकरण के मुद्दे पर आजकल खूब चर्चा हो रही है

सरकारी संस्थाओं के निजीकरण के मुद्दे पर आजकल खूब चर्चा हो रही है। होनी भी चाहिए। वैसे यदि लोकतंत्र में होने का मतलब सरकार के हर कदम का विरोध ही है, तो विरोध के इन स्वरों में एक स्वर मेरा भी रहेगा; पर सच यह है कि बेकार हो चुकी सरकारी संस्थाओं को ठीक करने का एकमात्र उपाय यही है कि उनका निजीकरण कर दिया जाय।

भारत सरकार की संस्था है BSNL, हमारे गांवों में सबसे पहले टावर इसी के गड़ने शुरू हुए थे। दो तीन सालों तक मोबाइल का मतलब bsnl ही होता था हमारे लिए… पर आज गांव में किसी के पास bsnl का सिम नहीं है। क्यों? क्योंकि लोड समाप्त होने के बाद भी, आज भी bsnl से फोन नहीं लगता। ऐसा क्यों होता है, इसका उत्तर किसी के पास नहीं। फिर कौन रखे bsnl का सिम?

भारतीय रेलवे दुनिया की सबसे बड़ी संस्थाओं में से एक है न? क्या दशा है उसकी? दिसम्बर जनवरी के कोहरे में प्राइवेट बसें राइट टाइम चलती हैं और ट्रेन चौबीस घण्टे देर से… क्यों? इसका उत्तर भी किसी के पास नहीं… मैं रेलबे के कर्मचारियों की क्षमता पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगा रहा, पर विभाग से कोई संतुष्ट नहीं है यह सच है।
स्वास्थ विभाग की दशा देख लीजिए! कौन जाता है सरकारी अस्पताल में? वही न, जिसके पास अब बिल्कुल भी पैसे नहीं बचे? कौन है जो कह सकता है कि वह सरकार की स्वास्थ्य व्यवस्था से संतुष्ट है? कोई नहीं! सरकार स्वास्थ्य के नाम पर खरबों खर्च करती है, पर कोई सरकारी अधिकारी या नेता सरकारी अस्पताल में नहीं जाता। क्यों??

आप स्कूलों को ही देख लीजिए। सरकारी और प्राइवेट स्कूलों के बीच का अंतर क्या बताना पड़ेगा? नहीं… सब जानते हैं।
आप करोड़ों रुपये खर्च कर के बने किसी सरकारी इमारत की दशा देखिये, उसमें पाँच वर्ष में ही पानी टपकने लगता है। उससे कम खर्च में निजी संस्थाओं की इमारतें बनती हैं, और चमचमाती हुई लम्बे समय तक टिकती हैं। क्यों होता है ऐसा?
साहब! सरकारी संस्थाओं में दीमक लग चुके हैं, और अधिकांश की दशा यह है कि वे पूरी तरह सड़ चुकी हैं। उन्हें बिना उजाड़े ठीक नहीं किया जा सकता।

एक बात और है! यह एक कठोर सत्य है कि भारत के लोग सरकारी व्यवस्था पर विश्वास करना ही छोड़ चुके हैं। स्कूल हो, अस्पताल हो या कोई अन्य विभाग, लोग ‘सरकारी’ पर भरोसा ही नहीं करते। अब सरकारी का मतलब ही बेकार हो गया है। ऐसा क्यों हुआ है, कैसे हुआ है, इसपर लम्बी चर्चा हो सकती है, पर ऐसा हुआ अवश्य है।

आप माने या न मानें, पर यह भी सच है कि सरकारी नौकरी मिल जाने के बाद हर व्यक्ति एक अजीब सी निश्चिन्तता और आसलपन में डूब जाता है। यदि वह अधिकारी हो जाय तो उसे अंततः भ्रष्ट होना ही पड़ता है। यह भ्रष्टाचार ही हर संस्था को ले डूबा है।
मैं मानता हूँ कि उच्च शिक्षण संस्थानों का निजीकरण आम जनता पर अनावश्यक बोझ बन जायेगा। और भी कुछ संस्थाएं हैं जिनका निजीकरण करना ठीक नहीं है, पर भ्रष्ट हो चुकी व्यवस्था को ठीक करने का दूसरा कोई उपाय नहीं। सरकार को आम जनता के ऊपर से बोझ कम करने की अतिरिक्त व्यवस्था करनी होगी, पर निजीकरण उतना बुरा नहीं जितना बताया जा रहा है।

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