*सखा – तुम्हारी विश्वसनीय इन्द्रिय*:- श्री श्री रवि शंकर

Post Date: May 25, 2020

*सखा – तुम्हारी विश्वसनीय इन्द्रिय*:- श्री श्री रवि शंकर

तीन विषय हैं: आत्मा, इन्द्रियाँ एवं वस्तु (संसार) और तीन शब्द है: सुख, दुःख और सखा। इन तीनो ही शब्दों में एक समानता है – ‘ख’, जिसका अर्थ है इन्द्रियाँ। आत्मा इन्द्रियों के द्वारा संसार का अनुभव करती है। जब इन्द्रियाँ आत्मा के साथ रहती हैं तब सुख होता हैं (क्योंकि आत्मा सुख और आनन्द का स्रोत है) जब इन्द्रियाँ आत्मा से विमुख हो, भौतिक विषयों के दलदल में फँस जाती हैं, तब दुःख होता है। यही दुःख है।
संसार – आत्मा
इन्द्रिय – (‘ख’)
दुःख – सुख
आत्मा का स्वभाव ही आनंद है। सभी इन्द्रियां आत्मा की ओर उड़ान भरने के लिए हैं। किसी भी सुखद अनुभूति में तुम आँखें मूँद लेते हो-किसी सुगन्धित फूल को सूंघते हो तब या कोई स्वादिष्ट खाना चखते हो, अथवा किसी वस्तु को स्पर्श करते हो। सुख वह है जो आत्मा की ओर ले जाता है। दुखी आत्मा से विमुख करता है। दुःख का यही अर्थ है कि, तुम आत्मा पर केन्द्रित होने के बदले विषय – वस्तु में फँसे हो, जो परिवर्तनशील है।
‘सखा’ शब्द का अर्थ है “वह ही इन्द्रिय है”। सखा वह है जो तुम्हारी इन्द्रिय ही है। अर्थात्, तुम्हारे माध्यम से मुझे ज्ञान मिलता है, तुम मेरी छठी इन्द्रिय हो। जिस प्रकार मैं अपने मन पर विश्वास करता हूँ, उसी तरह तुम पर भी विश्वास करता हूँ। एक मित्र इन्द्रियों की अनुभूति का विषय हो सकता है परन्तु ‘सखा’ स्वयं इन्द्रिय बन जाता है।
‘सखा’ वह साथी है जो सुख और दुःख दोनो अनुभवों में साथ रहता है। अर्थात् सखा वह है जो तुम्हें आत्मा की ओर वापस ले जाता है। जब तुम किसी विषय – भोग में फँस जाते हो, तब जो ज्ञान तुम्हें आत्मा की ओर वापस लाता है, वही शाखा है।
ज्ञान तुम्हारा साथी है और तुम्हारा साथी ज्ञान है।
गुरु ज्ञान का प्रतिरुप हैं। ‘सखा’ का अर्थ है, “वह मेरी इन्द्रियाँ है, मैं संसार को उसी ज्ञान के द्वारा, उनके माध्यम से देखता हूँ।”
कुछ वर्षों में तुम्हारा मस्तक मिट्टी में होगा, जीते जी अपना सर कीचड़ से मत भरो।
गुरु की दृष्टि से देखो तो पूरा विश्व दिव्य दिखेगा।

जय गुरुदेव

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