राजभंग योग

Post Date: July 16, 2020

राजभंग योग

राजभंग योग
यदि सूर्य तुला राशि में दस से कम अंशों का हो तो राजभंग योग का निर्माण होता है।

लग्न से छठे भाव में सूर्य तथा चंद्रमा हो एवं उन्हें शनि देखता हो तो राजभंग योग होता है।

शनि लग्न में या केंद्र में हो उसे कोई भी शुभ ग्रह न देखता हो तथा मंगलवार का जन्म हो तो राजभंग योग होता है।

चंद्रमा तथा मंगल मेष राशि में स्थित हो, उन्हें शनि देखता हो पर कोई अन्य शुभ ग्रह न देखता हो तो राज भंग योग सम्पन्न होता है।

केंद्र में चंद्रमा, सूर्य तथा शनि हो तो राजभंग योग होता है।

शनि केंद्र में हो, चंद्रमा लग्न में हो और गुरू बारहवें भाव में स्थित हो तो राजभंग योग होता है।

नवमेश बारहवें भाव में हो, पाप ग्रह केंद्र में हो तो राजभंग योग होता है।

गुरू राहु या केतु के साथ हो तथा उस पर शनि, मंगल या सूर्य में से किन्ही दो ग्रहों की दृष्टि हो तो राजभंग योग होता है।

मकर राशि में गुरू हो तथा उसे पापग्रह देख रहे हो राजभंग योग होता है।

लग्न का स्वामी नीच राशि में होकर सूर्य के साथ स्थित हो एवं उसे शनि देखता हो तो राजभंग योग होता है।

कोई भी दो पापग्रह दशम भाव में स्थित हो तथा दशमेश पर शुभग्रहों की दृष्टि न होतो राज भंग योग होता है।

नवमेश द्वादशस्थ हो, तीसरे भाव में पाप ग्रहों हो, बारहवें भाव का स्वामी दूसरे भाव में स्थित हो तो राजभंग योग होता है।

दशम भाव के अतिरिक्त अन्य भावों में सभी ग्रह नीच राशि में हो तो राजभंग योग होता है।

लग्नेश बारहवें भाव में हो, दशम स्थान में पाप ग्रह हो तथा दशम भाव में मंगल एवं चंद्रमा स्थित हों तो राज भंग योग होता है।

नवमेश बारहवें भाव में हो एवं लग्नेश तथा चंद्रमा जिस भाव में स्थित है, उस भाव का स्वामी ये दोनों शुभ ग्रहों से युक्त अथवा दृष्टि न हों या अस्त हों तो राजभंग योग होता है।

सप्तम भाव में बुध शुक्र हो, पंचम स्थान में गुरू हो, चतुर्थ भाव में पाप ग्रह हो तथा चंद्रमा से अष्टम भाव में पाप ग्रह हो तो राज भंग होता है।

लग्नेश, चंद्र लग्नेश, नवमेश, सूर्य, चंद्र तथा गुरू शत्रु राशियों में स्थित हो तो राजभंग योग होता है।

दशम भाव में चंद्रमा, सप्तम भाव में शुक्र तथा नवम भाव में पाप ग्रह हो तो राजभंग योग होता है।

शुक्र, बुध तथा चंद्रमा केंद्र स्थानों में हो तथा जन्म लग्न में राहु विद्यमान हो तो राजभंग योग होता है।

सप्तम भाव में सूर्य और चंद्रमा हो तथा उन्हे शनि देखता हो तो राजभंग योग होता है।

गुरू या सूर्य नीच राशि में होकर केंद्र में स्थित हो तथा पाप ग्रह से दृष्टि हो तो राजभंग होता है।

केंद्र में सभी पाप ग्रह हो और उन पर शुभग्रहों की दृष्टि न हो तथा गुरू अष्टम भाव में हो तो राजभंग योग होता है।

चंद्र एवं बुध दशम में हो, पाप ग्रहों में से किन्ही दो पाप ग्रहों की दृष्टि हो तथा एक पाप ग्रह साथ में हो एवं शुभ ग्रहों की दृष्टि से रहित हो तो राजभंग योग होता है।

यदि लग्नेश चंद्रमा से पंचम स्थान में हो, या दूसरे भाव में हो तथा पाप ग्रह चंद्रमा से अष्टम भाव में हो एवं चंद्रमा दशम भाव में हो तो राजभंग योग होता है।

सभी पाप ग्रह केंद्र, नीच राशियों में या शत्रु राशियों में स्थित हो तथा शुभ ग्रह षष्ठ, अष्टम एवं भाव में स्थित होकर देखते हो तो राजभंग योग होता है।

लग्नेश क्षीण हो तथा उसे अष्टमेश देखता हो एवं गुरू, सूर्य के साथ में हो तो राजभंग योग होता है।

चतुर्थेश एवं अष्टमेश साथ में हो तथा षष्ठेश से देखे जाते हो तो राजभंग योग होता है।

दशमेश पांचवें भाव में स्थित हो तथा लग्नेश नीच राशि में स्थित हो तो राजभंग योग होता है।

चतुर्थेश पाप ग्रह के साथ में होकर अस्त हो तो राजभंग योग होता है।

शुक्र, गुरू अस्त हों तथा लग्नेश पाप ग्रह के साथ हो तो राजभंग योग होता है।
शुभ ग्रह षष्ठ, अष्टम एवं द्वादश भाव में हो, पाप ग्रह केंद्र तथा त्रिकोण में हो तथा दूसरे भाव का स्वामी निर्बल हो तो राजभंग योग होता है।
दूसरे भाव का स्वामी तथा लग्नेश नीच राशि में स्थित हो एवं नवमेश सूर्य के साथ अस्त हो तो राजभंग योग सम्पन्न होता है।

कोई भी तीन ग्रह नीच राशि में हो या अस्त हो तथा लग्नेश शत्रु स्थान में हो अथवा निर्बल हो तो राजभंग योग होता है।

कितने ही शुभ एवं प्रबल योग जन्म कुंडली में हो पर यदि राजभंग योग कुंडली में होता है तो वह अकेला ही सभी शुभ एवं प्रबल योगों का नाश कर देता है। जातक दरिद्री, कामी, क्रोधी, सौभाग्यहीन वं मलिन होता है। स्वभाव से जातक आलसी, विवादी, चुगलखोर, पाप कर्म में रत, दुष्टात्मा तथा निन्दक होता है।

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