मंगल का अन्य ग्रहों पर से भ्रमण

Post Date: February 7, 2020

मंगल का अन्य ग्रहों पर से भ्रमण

मंगल का अन्य ग्रहों पर से भ्रमण

सूर्य
जन्म पत्रिका में जब मंगल सूर्य से युक्त या सूर्य से षष्ठ, सप्तम तथा दशम स्थान पर गोचर में होता है तो जातक को उस अवधि में पित्त जनित रोगों से कष्ट होता है। जातक का खर्च बहुत हो जाता है। व्यवसाय में उसे प्रायः अड़चन आती है। कार्यालय के वरिष्ठ अधिकारी खुश नहीं रहते। आंखों में तथा पेट में कष्ट होने की संभावना रहती है।

चंद्र
जन्म पत्रिका में जब मंगल चंद्रमा से युक्त या सूर्य से षष्ठ, सप्तम तथा दशम स्थान पर गोचर में होता है तो जातक को तो शरीर में चोट लगने की संभावना रहती है। जातक के मन में क्रोध अधिक रहता है। भाइयों द्वारा उसे कष्ट उठाना पड़ता है। उसके धन का नाश होता है। यदि जन्म पत्रिका में मंगल बलान् हो और कारक अथवा शुभ हो तो धन, भूमि, इत्यादि का विशेष लाभ रहता है।
मंगल
जन्म पत्रिका में जब मंगल स्वयं से युक्त या सूर्य षष्ठ, सप्तम तथा दशम स्थान पर गोचर में होता है तो जातक की जन्म पत्रिका में दूसरे, चौथे, पांचवे, सातवें, आठवें, नवें अथवा बारहवें किसी स्थान में है और विशेष बलवान न हो तो धन की हानि, कर्ज, नौकरी आदि में हानि, बल में कमी, भाइयों से कष्ट, लड़ाई-झगड़े जैसे दुष्परिणाम प्रदान करता है।
बुध
जन्म पत्रिका में जब मंगल बुध से युक्त या सूर्य से षष्ठ, सप्तम तथा दशम स्थान पर गोचर में होता है तो जातक को प्रायः अशुभ फल की प्राप्ति होती है। अनैतिक कार्य, गलत बहीखाते व कर की चोरी इस अवधि में पकड़ी जाती है। झूठी गवाही या जाली हस्ताक्षरों से संबंधित मुकदमे चलते हैं। जातक को व्यापार में अचानक हानि होती है।
गुरू
जन्म पत्रिका में जब मंगल गुरू से युक्त या सूर्य से षष्ठ, सप्तम तथा दशम स्थान पर गोचर में होता है तो जातक के लिए प्रायः शुभ फलदायी होता है। जातक का अधिकार बढ़ता है तथा उसकी उन्नति होती है। उसे लाभ होता है। धार्मिक कार्यो अथवा अध्यापन तथा वकालत के कार्यो से लाभ होता है।

शुक्र
जन्म पत्रिका में जब मंगल शुक्र से युक्त या सूर्य से षष्ठ, सप्तम तथा दशम स्थान पर गोचर में होता है तो जातक में काम भाव तीव्र होती है। जातक को पत्नी कष्ट की भी संभावना रहती है।
शनि
जन्म पत्रिका में जब मंगल शनि से युक्त या सूर्य से षष्ठ, सप्तम तथा दशम स्थान पर गोचर में होता है तथा जातक की जन्म पत्रिका में शनि द्वितीय, चतुर्थ, पंचम, अष्टम, नवम अथवा द्वादश भाव में शत्रु राशि में स्थित हो तो इस अवधि में दुख और कष्ट अष्टम होते हैं। भूमि की हानि होती है। झगड़े-मुकदमें बहुत खड़े हो जाते हैं। स्त्री वर्ग से हानि होती है। निम्न स्तर के लोगों, भृत्यों आदि से हानि उठानी पड़ती है। यदि जन्म पत्रिका में शनि और मंगल दोनों की स्थिति शुभ हो तो विशेष नुकसान नहीं होता। परंतु जातक को मस्तिष्क में तनाव उत्पन्न होते रहते हैं।

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