‘भगवान’ के छ : गुण : दो कदम बुद्धत्व की ओर – श्री श्री रवि शंकर

Post Date: July 4, 2020

‘भगवान’ के छ : गुण : दो कदम बुद्धत्व की ओर – श्री श्री रवि शंकर

आठवाँ भाग

और इसी वर्तमान क्षण में जीत त्याग हैः त्याग को हमने बहुत ही गलत समझा है। त्याग ही तो तुम्हें वर्तमान क्षण में जीने की क्षमता प्रदान करता है। यदि तुम भूतकाल की घटनाओं का या भविष्य की चिन्ताओं का त्याग नहीं कर सकते तो तुम वर्तमान क्षण में जी भी नहीं सकते। लोग तो त्याग मजबूरी में करते हैं। क्रोध में या हताशा में तुम चीजों को फैंक कर कहते हो, “बस बहुत हो गया, जाने दो, मैं इसका त्याग करता हूं – मैं इसे छोड़ता हूं,” आदि। यह तो त्याग न हुआ। यह तो चीजों को पकड़ना ही हुआ, जब तक तुम्हारा बस चलता है। किंतु अंततः तुम्हें छोड़ना ही पड़ता है। और फिर तुम उस निराशा की हालत में नकारते हुए छोड़ते हो।

ज्ञान से, प्रज्ञा से त्याग फलित होता है। प्रायः तुम सोचते हो कि फला फला कार्य पूर्ण करने के बाद मैं विश्राम में चला जाऊंगा। इन सबको पूरा कर लूं, तब इनसे मुक्त हो जाऊंगा। परन्तु  तुमने देखा होगा कि साधारणतया ऐसा हो नहीं पाता। इस प्रकार यह विश्राम का, मुक्ति का क्षण कभी न ही आता है, न ही आएगा। किसी भी समय, किसी भी चीज को, किसी भी काम को, चाहे वह पूरा हो गया हो, चाहे अधूरा हो, किसी भी क्षण संतोष सहित छोड़ देने की क्षमता, अपने को उससे अलग कर लेने की क्षमता को त्याग या ज्ञान कहते हैं। मान लो, तुम एक मनोरंजक किताब पढ़ रहे हो और बीच में ही उसे छोड़कर तुम सोना चाहो तो क्या होता है? क्या तुम सो पाते हो? या फिर हवाई जहाज में एक फिल्म दिखाई जा रही है और हालांकि तुम विश्राम करना चाहते हो। तुम कुछ देर आंखे बंद करके सोने की चेष्टा करते हो, परन्तु फिर मन में होता है कि आंखे खोलकर देखूं कि फिल्म में आगे क्या हुआ। पुनः पुनः आंखें खोलकर देखने को मन होता है। तुम बार-बार आंखें खोलते हो और तुम चैन से सो नहीं पाते। तुम अपने मन को रोकने में असमर्थ हो जाते हो। चाह को, जब भी चाहे, वही रोक दें, छोड़ दें, किसी भी समय मन को ठहराकर, विश्राम करने की और वापिस अपने स्वरूप में आ जाने की क्षमता को त्याग कहते हैं।

to be continued………..

The next part will be published tomorrow…

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