बोध और पर्यावरण : दो कदम बुद्धत्व की ओर – श्री श्री रवि शंकर

Post Date: July 7, 2020

बोध और पर्यावरण : दो कदम बुद्धत्व की ओर – श्री श्री रवि शंकर

दूसरा भाग

पूजा क्या है? पूजा का अर्थ है आदर, सत्कार, सम्मान और प्रशंसा और अपने जीवन में किसी अमुख तत्व के योगदान को मान्यता देना, और उसके प्रति आभार – यही है पूजा। है न? प्राचीर काल में यही तो लोग कर रहे थे। पूरे विश्व के आदिवासी – उत्तरी अमेरिका, दक्षिणी अमेरिका, अफ्रीका, चीन, भारत आदि – पृथ्वी, जल, अग्नि को मान देते हैं, उनकी पूजा करते हैं। इन तत्वों को चेतन (जीवन्त) समझ इनकी पूजा करो। देखो न, जो तत्व जीवन का पोणष कर रहा है, उसमें भी तो जीवन होगा ही न। क्योंकि ‘जीवन’ तो केवल जीवन्त से ही उत्पन्न हो सकता है। प्रचीन विचारधारा यही थी और यह सच भी है। जीवन्त ही जीवन का पोषण कर सकता है। आज के लोगों को देखो, वे ताजे फलों का रस, गाजर का रस, अंकुरित अनाज और हरी शाक-सब्जी खाना पसंद करते हैं, क्योंकि उनमें अधिक जीवन, प्राण ऊर्जा, शक्ति है। है कि नहीं?

जल को पवित्र मानने, उसकी पवित्रता समझने और उसे पवित्र बनाये रखने की बहुत आवश्यकता है। ऐसा ही वायु के लिए भी चाहिए। वायु के लिए संस्कृत में शब्द है ‘पवन’। पवन का अर्थ है पवित्र करने वाली, जो वनस्पति जगत को भी पवित्र कर देती है। अग्नि भी पावक है, यदि उसका प्रयोग ठीक ढंग से किया जाए। नहीं तो वह अग्नि, जो पावक है, वह प्रदूषण का कारण भी बन सकती है।

अपना मन भी तो ऐसा ही है न। मन सकारात्मक विचारों से अपने से अपने आसपास दुखद वातावरण बना सकता है। मन के इस स्वभाव को जरा सजग होकर देखें, थोड़ी पैनी दृष्टि से देखें तो पता चलेगा कि अपने भावों से हम आसपास के वातावरण को प्रभावित करते हैं। वातावरण में सकारात्मक तरंगें छोड़ते रहने से हम वातावरण का भावात्मक प्रदूषण करते रहते हैं। अब इस ओर भी मानव चेतना सजग हो रही है कि पर्यावरण को रसायनिक और भौतिक प्रदूषण के साथ-साथ भावात्मक प्रदूषण से भी बचाना है। यह तभी संभव है, जब हम अपने मन को ध्यान, ज्ञान और साधना के साबुन से शुद्ध करते रहें। केवल ज्ञान और विवेक के द्वारा ही पता चलता है कि वस्तुएं कैसी हैं और कैसे हमारी सकारात्मक और नकारात्मक तरंगें और भाव उनको प्रभावित करते हैं। तभी हम इनके परिणमों और प्रभावों के प्रति संवेदनशील हो सकते हैं और अपने आसपास एक प्रेम-मय वातावरण के बनाने का दायित्व ले सकते हैं।

मन का दुखी हो जाना, दूषित और नकारात्मक भावों का आना कोई अस्वाभाविक घटना नहीं; यह तो बहुत ही स्वाभाविक है। सीखना या जानना केवल यह है कि कैसे दुखी और दूषित मन को जल्दी से जल्दी पुनः आनन्द और आत्मिक लयबद्धता की ओर लौटाया जा सके। इसीलिए साधना, ध्यान और प्राणायाम की प्रक्रियाओं का महत्व है। इन प्रकियाओं के द्वारा तुम अपने भीतर और आसपास सकारात्मक और प्रेमपूर्ण तरंगें उत्पन्न कर सकते हो और सारे वातावरण में खुशी की उल्लासमयी और आनन्दपूर्ण तरंगें बिखेर सकते हो। हां तो अब जब कहीं भी विचारण करो, तो सृष्टि में और अपने में पांच महाभूतों की उपस्थिति के प्रति सजग और संवेदनशील रहना।

प्रश्न – प्रियवर गुरूजी, केवल एक आध्यात्मिक गुरू का अनुसरण ठीक है अथवा अनेक का?  यदि वे भिन्न-भिन्न पद्धतियां बतायें, जो परस्पर विरोधाभासी हों तो क्या होगा? यह पता कैसे चले कि जिस मार्ग पर मैं चल रहा हूं, वह मेरे लिए उचित है कि नहीं? जय गुरूदेव।

उत्तर – यदि उलझनों में उलझने को तैयार हो तो चाहे जितने मार्गों व पद्धतियों में उलझो। आज के जीवन में हर बात के लिए अनेक विकल्प हैं। अध्यात्म के विकल्पों का बोझा भी चाहो तो ले लो। उचित यही है कि, आदर सबको दो परन्तु चलो एक ही मार्ग पर शीघ्र प्रगति के लिए यही श्रेष्ठ है कि दृढ़ता से सतत् एक मार्ग पर चलो।

प्रश्न – प्रगति के चिन्ह क्या हैं?

उत्तर – अपने विषय में कोई निर्णय लेने या धारणा बनाने की तुम चिन्ता छोड़ दो। अपना मूल्यांकन छोड़ दो तो यह अपने में एक प्रगति चिन्ह है। वास्तव में तुम्हारे प्रति मूल्यांकन या तो तुम्हें घमण्डी बना देता है या तुम्हारे में हीन भावना भर देता है। अध्यात्म के पथ पर जब भी लगे ‘मैंने तो बहुत प्रगति कर ली’ तो समझना कि प्रगति हुई ही नहीं। हां, व्यावहारिक दृष्टि से ऐसा लग भी सकता है। कि छोटी-छोटी बातें अब तुम्हें इतना परेशान नहीं करती। यह शुभ है। परन्तु हो सकता है कहीं कोई घटना, व्यक्ति या वस्तुस्थिति तुम्हें फिर उद्देलित कर दे; तुम्हें क्रोध आए लगे वही पुरानी प्रवृत्तियां फिर उभर आई, तो तुम अपने को कोसने लगोगे, तुम्हारा अहं चूर-चूर हो जाएगा, तुम अपराध भाव से भर जाओगे। लगेगा, प्रगति पथ पर आगे बढ़ना एक भ्रम था। तुम तो वहीं खड़े हो। वह सब भाव, यह सब मूल्यांकन तुम्हारी साधना में बाधक हैं। अतः मूल्यांकन को मूल्य न देना ही अध्यात्मक के पथ पर अग्रसर होना है। यही समर्पण है कि चलते चलो क्या होगा, इसका परवाह मत करो।

to be continued………..

The next part will be published tomorrow…

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