प्रकृति और विकृति: दो कदम बुद्धत्व की ओर – श्री श्री रवि शंकर

Post Date: May 18, 2020

प्रकृति और विकृति: दो कदम बुद्धत्व की ओर – श्री श्री रवि शंकर

तीसरा भाग:

यह सारा अस्तित्व प्रकृति और उसकी विकृति से मिलकर बना है।
प्रकृति का स्वभाव और उसमें होने वाले विकार। क्रोध हमारा स्वभाव
नहीं है, बल्कि यह हमारे स्वभाव के प्रतिकूल है। ऐसे ही ईर्ष्या हमारा
स्वभाव न होकर उसके विपरीत आया हुआ विकार है। हम क्यों क्रोध,
लोभ, ईर्ष्या और कामवासना को अशुद्धि मानते हैं? ये सब प्रकृति में
हैं तुम किसी कुत्ते को छेड़ कर देखो तो कैसे वह तुम्हारे ऊपर गुर्राता
है, किसी छोटे बच्चे को तंग करो तो वह भी क्रोध में आ जाता है।
कामवासना तो सारी प्रकृति में विद्यमान ही है-इसी से तो सृष्टि का
सृजन हुआ है। इच्छाएं और वासनाएं भी प्रकृति का ही भाग हैं। फिर
हम उन्हें विकृति या विकार की संज्ञा क्यों देते हैं? क्यों वे अशुद्ध हैं?
क्योंकि इनके द्वारा हमारी चेतना पूर्ण रूप से विकसित नहीं हो पाती।
पाप वही है जिसके कारण हमारी चेतना (आत्मा) की आभा पूर्ण रूप
से चमक नहीं पाती। समझ में आ रहा है न? यदि हम कुछ ऐसा
करते हैं, जिससे हमारी आत्मा या हमारा अन्तरंग स्वभाव खिल नहीं
पाता या जिससे हमारी सत्य-परायणता फीकी पड़ती है या उसमें कमी

आती है, उसे हम पाप कहते हैं। पाप तुम्हारा स्वभाव नहीं है। तुम्हारे
जन्म का कारण पाप नहीं है। पाप तो केवल कपड़े की सतह पर पड़ी
हुई सलवटें हैं-बस उन सलवटों को ठीक तरह से निकाल देना है।
उनको सीधा कर देना है। बस।

to be continued………..

The next part will be published tomorrow…

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