नवम भाव में गुरू का प्रभाव

Post Date: March 30, 2020

नवम भाव में गुरू का प्रभाव

नवम भाव में गुरू का प्रभाव

कुंडली के नवम भाव से भाग्य, प्रवास, तीर्थ यात्राये धर्म, मानसिक वत्ति, भाग्योदय, तप, दान, इन सब बातों की जानकारी हमें प्राप्त होती है।
नवम भाव में गुरू स्थित होने से जातक धर्म व ज्ञान के कारक गुरू के प्रभाव से धार्मिक वृत्ति का होता है। यह धार्मिक स्थलों की तीर्थयात्राएँ करता है। देवताओं के गुरू नवम भाव में स्थित होने से ऐसा जातक देवताओं के लिये यज्ञ करता है। गुरू ग्रह धर्म का कारक होने से धार्मिक स्थल, साधु संतों के निवास, आश्रम, कथा स्थल, पूजा, घर मंदिर मस्जिद चर्च आदि स्थान गुरू के कारकत्वों में आते है। जातक को इन स्थलों पर कार्य करने से या आश्रम में महंत बनने से उसे सफलता प्राप्त होती है। जातक ज्योतिष से संबंधित काम करे तो उसे सफलता मिलती है। नवम भाव में गुरू स्थित होने से जातक शास्त्रों को जाननेवाला होता है। उसे कानून व न्याय से संबंधित कामों में सफलता मिलती है। नवम भाव में गुरू के प्रभाव से जातक अपने जीवन में सभी सुखों को प्राप्त करता है। वह भाग्यवान, ऐश्वर्यशाली होता है। जातक की ईश्वर पर पूर्ण आस्था होती है। भाग्यशाली होने का अर्थ है जातक के जीवन में सभी पक्षो से सुख होना। इसलिये नवम भाव में गुरू स्थित होने से जातक को जीवन में किसी प्रकार की कमी महसूस नहीं होती। जातक को जीवन में सभी शुभ फल प्राप्त होते हैं। ऐसे जातक को यज्ञ व दान करने से मन को शांति मिलती है। नवम भाव में गुरू स्थित होने से ऐसा जातक को यज्ञ व दान करने से मन को शांति मिलती है। नवम भाव में गुरू स्थित होने से ऐसा जातक पुण्यकर्म करनेवाला, विद्वान, व्रत उपवास करनेवाला व ब्राह्मणों की सेवा करने वाला होता है। स्वभाव से शांत व अच्छे आचरण वाला होता है। वह उच्चशिक्षित व वेदो को जानने वाला होता है। जातक अपने बडों व गुरूजनों का आदर व मान रखनेवाला होता है। गुरू ही हमें ज्ञान व धर्म पर ईमानदारी से चलने की शिक्षा व उपदेश देते हैं।

सप्तम दृष्टि
नवम भाव में स्थित गुरू की सप्तम दृष्टि भाव पर पडती है। गुरू की तृतीय भाव पर दृष्टि होने से जातक को भाईयोका सुख मिलता है। उसके पराक्रम में वृद्धि होती है।

पंचम दृष्टि
नवम भाव में स्थित गुरू की पंचम दृष्टि प्रथम (लग्न) भाव पर पडती है। गुरू की लग्न पर दृष्टि होने से जातक दिखवे में सुंदर व गोरा हैता है। वह ज्ञानी व विद्वान होता है। उसके चेहरे में आकर्षण होता है।

नवम दृष्टि
नवम भाव में स्थित गुरू की नवम दृष्टि पंचम भाव पर पडती है। गुरू की पंचम भाप पर दृष्टि होने से जातक की संतान अपने जीवन में प्रगति करती गै। जातक अपनी बुद्धि व शिक्षा के बल पर सफलता प्राप्त करता है।

नवम भाव में गुरू का मित्रराशि में प्रभाव
नवम भाव में गुरू मित्रराशि में होने से जातक भाग्यशाली व धार्मिक वृत्ति का होता है। वह धार्मिक तीर्थयात्रा करता है।

नवम भाव में गुरू का शत्रुराशि में प्रभाव
नवम भाव में गुरू शत्रुराशि में स्थित होने से जातक को भाग्य का साथ नहीं मिलता। जातक को परिश्रम के बाद सफलता मिलती है।

नवम भाव में गुरू का स्वराशि, उच्च व नीच राशि में प्रभाव
नवम भाव में गुरू स्वराशि धनु या मीन में स्थित होने से जातक को भाग्य के प्रभाव से उन्नति व यश प्राप्त होता है। वह धर्म का पालन करता है।

नवम भाव में गुरू अपनी उच्च राशि कर्क में स्थित होने से जातक के भाग्य में वृद्धि होती है। जातक को मान सम्मान व सुख प्राप्त होता है।

नवम भाव में गुरू अपनी नीच राशि मकर में स्थित होने से जातक के भाग्य में कमी रहती है तथा वह धर्म का पालन नहीं कर पाता जातक को मान व प्रतिष्ठा पाने के लिये संघर्ष करना पडता है।

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