गुह्यतम ज्ञान अथवा सर्वसार : दो कदम बुद्धत्व की ओर – श्री श्री रवि शंकर

Post Date: June 21, 2020

गुह्यतम ज्ञान अथवा सर्वसार : दो कदम बुद्धत्व की ओर – श्री श्री रवि शंकर

तीसरा भाग

भारत के सभी संत भी यही तो कहते आ रहे हैं कि परमात्मा के घर का रास्ता गुरू के द्वारा ही मिलता है। सभी संतों ने यही कहा, इसमें कोई अपवाद है ही नहीं। सिख गुरूओं ने तो इसे गुरूद्वारे का नाम दे दिया अर्थात गुरू ही उस परम तक पहुंचने का द्वार है। उनके पूजा स्थल को गुरूद्वारा ही कहते हैं। भाव यह है कि पहले ‘परम’ को, दिव्य को, अपने आसपास के पांच महाभूतों – पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश (जिनमें हम जी रहे हैं, जिनके कारण हमारा पृथ्वी पर अस्तित्व है) – में देख पायें; अपने आसपास के लोगों में, जीव-जन्तुओं में और स्वयं अपने में देख पायें।

परन्तु सामान्य प्रवृति यह है कि हम अपने सम्पर्क में आने वाले हर व्यक्ति, वस्तु या स्थिति से तो दिव्यता को नकार देते हैं और उसे किसी कल्पना लोक में खोजने का प्रयास करते हैं। संभवतः कोई प्रकाश पुंज आकाश में उभरेगा और कहेगा, “वत्स तुम्हें क्या चाहिए, मैं तुम्हारी मोनकामना पूरी करने आया हूं।” नही नही, ऐसा कदापि नहीं। यदि दिव्य के दर्शन आसपास के साकार रूपों में नहीं, ऐसा कदापि नहीं। यदि दिव्य के दर्शन आसपास के साकार रूपों में नहीं हुए तो निराकार में वह दर्शन असंभव है। बाकी सब तो केवल मन की परिकल्पना है। इससे जीवन में प्रगति की ओर गति नहीं होगी। हमारी जीवन शैली नाम-रूप से ही तो जुड़ी हुई हैं। हमारा परिचय केवल उसी से ही है। तुम मुझे देख सुन सकते हो, अपनापन बना सकते हो, खाली स्थान से नहीं। उस खाली स्थान का तो तुम्हें भान तक नहीं होता उससे कोई लेनदेन बनाना, संबंध स्थापित करना तो दूर की बात है।

to be continued………..

The next part will be published tomorrow…

Share the post

Share this post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *