गुरूजी, हम कार्य में संतुष्टि किस प्रकार पा सकते हैं?

Post Date: April 18, 2020

गुरूजी, हम कार्य में संतुष्टि किस प्रकार पा सकते हैं?

यह शब्द “कार्य संतुष्टि,” (work satisfaction) विद्यमान नहीं है या यह केवल शब्दकोशों में ही विद्यमान है। संतोष आपको तब मिलता है, जब आप कुछ सेवा करते हैं। आपकी नौकरी एक कर्तव्य है, जिसे आप पूरा कर रहे हैं, यह बिल्कुल भी सेवा जैसा नहीं है।

कोई व्यक्ति अपने कार्य को रूचिकर कैसे बना सकता है? किसी कार्य को रूचिकर बनाने की आपकी प्रबल इच्छा अंतर ला सकती है। यहां इसके लिए पहले से तैयार कोई भी फार्मूला नहीं है। आपको नवोन्वेषी (innovative)  होना होगा। आप एक निर्णय लें-आज मैं ऊबने वाला नहीं हूँ। जो कुछ भी मैं करता हूँ, मैं उसका पूरा आनंद लूँगा। यह एक दृढ़ निर्णय लें। जो कुछ करते रहने का प्रयास करें, इसे एक चुनौती के रूप में लें, और आप पायेंगें कि आप का कार्य के प्रति दृष्टिकोण बदल जायेगा।

आजकल विश्व में, यह प्रतीत होता है कि आध्यात्मिक ज्ञान का व्यापार करने से अधिक धन अर्जित होता है। ऐसा ही काँरेपोरेट जगत में भी है, क्या हमें आध्यात्मिक ज्ञान का व्यापार शुरू करना चाहिए, ताकि हम अधिक से अधिक धन और अधिक मात्रा में प्रसन्नता प्राप्त कर सकें?

सबसे पहले, अगर आप सोचते हैं कि आपकी प्रसन्नता का मापदंड केवल धन है तो आप गलत हैं। हाल ही में एक अध्ययन किया गया था। क्या आप जानते हैं कि विश्व में सबसे प्रसन्न लोग कहां रहते हैं? नाइजीरिया में और इसके बाद बंग्लादेश में। मैं समझता हूँ कि भारत पांचवें या छठे स्थान पर आता है। धन वह वस्तु नहीं नहीं है जिसके द्वार आप प्रसन्नता प्राप्त करते हैं, इसके बारे में भूल जाइये। आपके पास पर्याप्त धन हो सकता है लेकिन आप कई व्यंजन नहीं खा सकते हैं, आपको मधुमेह या उच्च कोलेस्ट्राल की बीमारी हो सकती है। आपको बिना घी के सूखी रोटी खानी पड़ेगी। आपको नींद न आए; आप अनिद्र से पीड़ित हो सकते हैं। आधा स्वास्थ हमने धन अर्जन करने में खर्च कर दिया और इसके बाद आधा धन हमने उस स्वास्थ्य को प्राप्त करने में खर्च कर दिया, जिसे हमने खो दिया है। मैं नहीं समझता कि यह जीने का एक बुद्धिमतापूर्ण ढंग है।

दूसरी बात जिसके बारे में आपने पूछा, कि आध्यात्मिकता बढ़ती हुई दिखाई देती है- तिरूपति 1000 करोड़ रूपये का राजस्व अर्जित करता है, सबरीमाला भी करोड़ों रूपये कमाता है। इसलिए क्या हमें काँरपोरेट जगत को छोड़ देना चाहिए और धर्म को एक व्यापार के रूप में शुरू कर देना चाहिए? यदि आप आध्यात्मिकता को एक व्यापार के रूप में सोचते हैं, न ही व्यापार और न ही आध्यात्मिकता प्रभावी ढ़ग से होगी। जब आध्यात्मिकता को एक सेवा के रूप में स्वीकार करते हैं, परियोजनाओं को चलाने के लिए जिन वस्तुओं की आवश्यकता है, उन्हें आप समाज को दी जाने वाली अपनी सेवा में शामिल करें, तो सभी आवश्यकतायें अपने आप ही पूर्ण होंगी। जब आप आध्यात्मिक रूप से रहते हैं, आप लेते कम हैं और देते ज्यादा हैं। व्यापार में आप लेते अधिक है और देते कम हैं। और यही सही फार्मूला है। यदि आप व्यापार को उसी तरह से करें जिस ढंग से आप आध्यात्मिकता का अभ्यास करते हैं, आपको इसे अतिशीघ्र बंद करना पड़ेगा। आप 100 रूपये का कच्चा माल खरीदते हैं और दूसरी जगह इसे 80 रूपये में बेचते हैं, आप कितने दिन तक ऐसा कर सकते हैं? आपको लाभ कमाने के लिए हमेशा किसी वस्तु कम देते है और अधिक प्राप्त करते हैं। इसी ढंग से व्यापार चलता है। लेकिन जब आध्यात्मिकता का अभ्यास करते हैं, आप बहुत कम प्राप्त करते हैं और अधिक से अधिक देने का प्रयास करते हैं, ताकि आप अपनेपन की भावना का अनुभव कर सकें, कुछ कर पाने की भावना का अनुभव। जीवन के ये दोनों ढंग भिन्न गणनाओं पर आधारित हैं, लेकिन मानव जीवन को दोनों की ही

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