कृतज्ञ मत हो!:- श्री श्री रवि शंकर

Post Date: July 3, 2020

कृतज्ञ मत हो!:- श्री श्री रवि शंकर

आज (वर्तमान) ईश्वर से मिला उपहार है-इसलिए इसे ” प्रेज़ेन्ट” (उपहार) कहते हैं।
सावधान! यह ज्ञान-पत्र विस्फोटक है। यह तुम्हारे दिल या दिमाग का विस्फोट कर सकता है। यदि हृदय के टुकड़े हो जाएं-कुछ नहीं बचता! यदि तुम्हारे दिमाग के टुकड़े कर दे-समझो सब-कुछ मिल गया!
श्री श्री: यहाँ तुम में से कितने व्यक्ति कृतज्ञ हो (सभी ने हाथ उठाया)

अगर तुम कृतज्ञ हो, तो तुम मेरे नहीं हो! (सब स्तब्ध रह गये)
यदि कोई तुम्हें कुछ देता है और तुम आभारी होते हो, इसका मतलब तुम स्वयं को उनसे अलग समझते हो। तुम अपने प्रति कभी आभार नहीं प्रकट करते। आभार दर्शाने का अर्थ हुआ कि तुम अपने आप को गुरु का अंश नहीं समझते।
माइक: हाँ, हम जिस हाथ से खाना खाते हैं, उस हाथ के प्रीति तो आभारी नहीं होते। एंजेलिका: बच्चे जब तक अपनापन अनुभव करते हैं, तब तक कृतज्ञ नहीं होते। वे सब चीज़ पर अपना हक समझते हैं।
श्री श्री: कृतज्ञता से भी आगे जाने पर एक मेल होता है। न “मैं” रहता है, न “तुम”। तुम गुरु के हिस्से हो। सब एक ही हैं, एक ही आत्मा जिसके हजारों सिर, हजारों हाथ हैं, पर हृदय एक ही है।
इस पथ पर कृतज्ञ तो होना ही है, कृतज्ञता अनिवार्य है, लेकिन तुम्हें कृतज्ञता से भी आगे बढ़ना है। अच्छा यही है कि तुम कृतज्ञ न बनो! (हँसी)
जब तुम कृतज्ञ होते हो, तुम केन्द्र बन जाते हो, तुम महत्वपूर्ण महसूस करने लगते हो। जब तुम किसी भी खूबसूरत वस्तु के लिए ईश्वर के प्रति कृतज्ञ होते हो-जैसे तुम्हारी आखों की दृष्टि-कौन ज्यादा महत्वपूर्ण हुआ? तुम या ईश्वर? तुम! तो तुम्हारी कृतज्ञता अहंकार दर्शाती है।
रिचर्ड: आप कृतज्ञ (grateful) नहीं है?
श्री श्री: मैं महान (ग्रेट) भी हूँ और पूर्ण (फुल) भी-( हतंजमनिस)। कृतज्ञ मत बनो। महान बनो और पूर्ण बनो | श्रद्धा के बिना यह ज्ञान खतरनाक हो सकता है! जब तुम गुरु के अंश हो, तुम्हें खुश रहने का पूरा अधिकार है; ज्ञान, आनन्द और समस्त सृष्टि पर तुम्हारा पूरा अधिकार है!
बाल्डर: क्या आप मित्रों के साथ हमारे सम्बन्ध और गुरु के साथ हमारे सम्बन्ध की तुलना कर सकते हैं?
श्री श्री: तुम्हारे मित्र तुम्हें साँसारिकता से, वस्तु-विषयों से बाँधते हैं; गुरु तुम्हे ईश्वर से, आत्मा से जोड़ते हैं।

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