कुंडली के दसवें घर में शनि का प्रभाव | दसवें घर में शनि | Significance of Saturn in 10th House

Post Date: April 14, 2021

कुंडली के दसवें घर में शनि का प्रभाव | दसवें घर में शनि | Significance of Saturn in 10th House

जन्मकुंडली में दशम भाव को कर्म भाव के नाम से  जाना जाता है। इसे केंद्र स्थान कहा जाता है। इस भाव से जातक के व्यवसाय मान-सम्मान तथा कर्म से संबंधित सभी विषयों का विचार किया जाता है। शनि यदि दशम भाव में स्थित हो तो उसकी दृष्टियां द्वादश, चतुर्थ  तथा सप्तम  भावों पर रहती हैं। कुंडली के दसवें घर में शनि का महत्व तथा प्रभाव जातक के व्यवसाय, बंधू-बांधव और वैवाहिक क्षेत्र में पड़ता है। इस भाव में स्थित शनि अन्य ग्रहो की युति, दृष्टि व स्वामित्व के अनुसार शुभ-अशुभ फल भी  प्रदान करता है।

 

कुंडली के दसवें घर में शनि का महत्व

दशम स्थान में स्थित शनि के प्रभाव से जातक सुखी, प्रवासी, बलवान, साहसी, पराक्रमी एवं भावुक होता है। जातक  महत्वाकांक्षी एवं सफल व्यवसायी होता है। जातक न्यायप्रिय, भाग्यशाली, उदार और धनवान होता है। जातक में लोगों का नेतृत्व करने का स्वभाविक गुण होता है।

कुंडली में 10 वें घर में स्थित ग्रह शनि, पेशेवर जीवन में लगातार बदलाव लाता है या जीवन के समय में दो बार से अधिक व्यक्ति के कैरियर को पूरी तरह से बदल देता है। राजनीति और इससे जुड़ी गतिविधियां उनके लिए सर्वोपरि होंगी, इस प्रकार ये लोग राजनीतिक क्षेत्र में अच्छी तरह से विकसित होने की क्षमता के साथ-साथ कौशल भी रखते हैं। और एक कुशल शासक बन सकते हैं।

दरअसल, लग्न या लग्न से दसवें घर में शनि या शनि के साथ जातक कार्य या पेशे में असंतोष करता है, इसलिए वे नए प्रतिमान तलाशते रहते हैं, जो अंततः उन्हें किसी भी स्तर तक ऊपर ले जाते हैं और इसलिए वे जीवन में स्थिरता प्राप्त करते हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार, दसवें घर में शनि यदि अच्छी तरह से निपट जाता है, तो व्यक्ति बहादुर,  उदार,  धनवान बन जाता है और इसलिए नाम प्रसिद्धि अपने आप उनके मार्ग पर आ जाती है।

 

 

कुण्डली के दसवें घर में शनि  की स्थिति

दशम भाव में शनि की स्थिति अपना एक विशेष महत्व रखती है| ऐसे जातक के संपूर्ण कर्मक्षेत्र पर शनि के प्रभाव का सकारात्मक या नकारात्मक- दृष्टिकोण होता है  वह श्रेष्ठ संपति वाला, सम्मानित,  अनुचरवर्ग में नीति द्वारा प्रशंसित (पूजित), शत्रु संहारक तथा प्रवासकाल में उत्त्मोतम यश-भोग प्राप्त करने वाला होता है। दशम भावस्थ शनि का जातक मातृ-सुख से वंचित होकर अजा (बकरी) के दुग्ध पर जीवित रहता है और पितृ-स्नेह का विनाश होता है। वह मातृ-पितृ विहीन स्थिति में अपने श्रम पर विश्वास करता है। और निरंतर श्रम से जातक अनेक प्रकार के सुखों का भोग करता है।

वह राजगृह में विश्वसनीय होता है तथा कोषाधिकारी अथवा दंडाधिकारी सदृश महत्वपूर्ण पद प्राप्त करता है। वह पैतृक संपत्ति का उपभोग नहीं कर पाता, किंतु अपने उधोग से भौतिक सुख-यश प्राप्त करता है। ऐसा जातक नीति-विशारद,  विनम्र एवं सत्ताधिश का सचिव होता है। उसे अनेक श्रेष्ठ अधिकार प्राप्त होते हैं। दैवज्ञ महेश का कहना है कि ऐसा जातक अपने बुंद्धि कौशल से संपत्ति तथा सुयश प्राप्त करता है। ऐसा होने से जातक अत्याधिक महत्वकांक्षी होता है और जातक में नेतृत्व के गुण भी होते हैं ऐसे जातक नगर गांव या जनसमूह के नेता भी हो सकते हैं। ऐसे जातक बहुत पराक्रमी होते हैं और अपने पराक्रम के बल पर जीवन में खूब सारी सफलताएं अर्जित करते हैं।

 

 

व्यवसाय और कर्म भाव में शनि

ऐसा व्यक्ति प्रतिष्ठित और प्रभावी संस्थाओं के प्रमुख अधिकारी के रूप में काम करता है| ऐसे व्यक्ति विधि एवं न्यायालय के क्षेत्र में ख्याति, उच्च पद एवं धन प्राप्त करता है| जातक अपने पुरुषार्थ एवं सौभाग्य से लगातार विकास करते रहता है | दशमस्थ शनि वक्री हो तो जातक वकील  न्यायाधीश,  गांव का मुखिया या  मंत्री होता है।  जातक जीवन भर धर्म के कामों में रुचि लेता है और लोग इनसे बहुत प्रेम करते हैं।

 

 

दशम भाव में शनि का शुभ और अशुभ फल

शनि यदि दशम भाव में मकर, तुला, कुम्भ तथा मिथुन राशि में बैठा है और शुभ ग्रह से युत है तो शुभ फल प्रदान करता है| इसी भाव में शनि यदि मेष, वृश्चिक एवं मीन राशि में स्थित है तो अशुभ फल देने में समर्थ होता है।

यदि शनि अशुभ ग्रह यथा सूर्य, मंगल, राहु इत्यादि से युत हो तो अशुभ फल देने में सहायक होता है। नौकरी या व्यवसाय में निरंतर अवरोध तथा असफलता प्राप्त होता है। उसे अपनी योग्यता के अनुरूप नौकरी नही मिलता है, उच्चाधिकारी से विवाद एवं जनसेवा में अपयश मिलता है।

 

इस भाव में शनि होने पर व्यक्ति धनी, राज्यमंत्री  या उच्चपद पर आसीन होता है। अगर यहां किसी क्रूर ग्रहों का प्रभाव हो तो जातक गैरकानूनी कामों में संलप्ति हो सकता है। जिससे जातक की बदनामी भी हो सकती है।

 

 

 

 

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