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अभिभावकों की भूमिका: परिचय अपने बच्चों से– श्री श्री रवि शंकर

Post Date: July 31, 2020

अभिभावकों की भूमिका: परिचय अपने बच्चों से– श्री श्री रवि शंकर

पाँचवाँ भाग

7 . आपसी मित्रता

प्रतिदिन एक नया मित्र बनाना हमारे विद्यार्थी जीवन को कितना दिलचस्प बना सकता है। अगर एक कक्षा में बीस विद्यार्थी हैं तो क्या सब आपस में एक दूसरे से मित्रता का भाव रखते हैं? शायद नहीं, अगर एक विद्यार्थी अपनी कक्षा में उपस्थित बीस बच्चों के साथ मित्रवत नहीं हो सकता है तो वह विद्यालय से बाहर जाने के बाद पूरे संसार में उपस्थित लोगों के साथ मैत्रीभाव कैसे रख पायेगा? उसकी मित्र बनाने की क्षमता बहुत सीमित है। विद्यालय एक ऐसा स्थान है जहाँ पर वह अपनी इस क्षमता का विकास कर सकता है – बहुत सारे लोगों से मिलकर उन्हें अपना मित्र बना सकता है। अगर वह यह निर्धारित करे कि प्रतिदिन या प्रति सप्ताह वह एक नया मित्र बनायेगा तो ऐसा करने से उसके व्यक्तित्व का निखार होगा। वास्तव में शिक्षा वह ही है जो हमारे व्यक्तित्व का विकास करे और यह पुष्ट करे कि हमारा हमारे चारों ओर के लोगों के साथ व्यवहार अच्छा हो।

वह क्या है जो एक विद्यार्थी को अपने चारों ओर के लोगों से मित्रता करने से रोकता हैं?  उसकी यह भावना कि लोग मेरे विषय में क्या सोचेंगे। अगर उनके भीतर ऐसा कोई भय हो तो इसे दूर करने के लिए उन्हें अपने चारों ओर के लोगों से बात करके उनसे मैत्री का हाथ बढ़ाना चाहिए। ऐसा करने से वे इस भय से बाहर आ सकते हैं। यह भय उनकी अपनी सोच का परिणाम है और यह बेहतर होगा कि बचपन में ही वे इससे बाहर निकल जायें। जैसे-जैसे हम बड़े होते जाते हैं, ऐसा करना कठिन होता जाता है। उन्हें सबसे मित्रता का भाव रखना चाहिए। यह एक अच्छी बात है। उन्हें यह नहीं सोचना चाहिए कि दूसरे उनके बारे में क्या सोचेंगे या उन्हें स्वीकार करेंगे या नहीं करेंगे या उससे उनके आत्मसम्मान को ठेस पहुँचेगी। इन सब बातों को सोचना छोड़कर, उन्हें अन्जान लोगों का भी अभिवादन करना चाहिए और उन्हें अपना मित्र बनाना चाहिए। इससे उनका व्यक्तित्व खिलेगा। उन्हें एक डायरी रखनी चाहिए, जिसमें वह यह लिख सकते हैं कि एक साल में उन्होंने कितने नये मित्र बनाये। इस धरती पर अरबों लोग रहते हैं ओर उनमें से मात्र हजार या सौ लोगों से हमें मिलने का अवसर मिलता है और उनमें से कुछ लोगों से ही हम बात करते हैं। जिनसे हम बात करते हैं, उनमें से कुछ ही होते हैं, जो हमारे मित्र बनते हैं।

 

8 . अपनापन

विद्यालयों में बहुत सारे खेलों का आयोजन होता है। जिसमें से एक खेल ऐसा होता है, जिसमें बच्चे आपसे में कुछ हफ्तों के लिए अपने नामों का आदन प्रदान कर लेते हैं। जिसमें उन्हें बहुत आनन्द आता है। इस प्रक्रिया में वे विद्यालय में सबके साथ अपनापन महसूस करते हैं जिससे बहुत प्रेम और आत्मीयता बढ़ती है। उनमें पहले, से ही ऐसा स्वभाव होता है। उनके मन में शिक्षकों के प्रति अपनेपन का भाव होना चाहिए। उनका अपने विद्यालय से एक आत्मीय सम्बन्ध होना चाहिए। न कि वे ऐसा महसूस करें कि विद्यालय एक सार्वजनिक सम्पत्ति मात्र है। उनको हर आयु, वर्ग और सभ्यता के लोगों के साथ अपनापन महसूस करना चाहिए। ऐसा उनके विकास में सहायक होगा। उनके मन, बुद्धि और हृदय का सर्वांगीण विकास होगा।

to be continued………..

The next part will be published tomorrow…

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