अथर्ववेद | अथर्ववेद का अर्थ, स्वरूप, शाखाएं 2020

Post Date: October 4, 2019

अथर्ववेद | अथर्ववेद का अर्थ, स्वरूप, शाखाएं 2020

अथर्ववेद में जीवन और समाज के नियमो का संकलन है। यह एक प्रकार से नीतिशास्त्र है। प्रत्येक व्यक्ति के धर्म और न्याय सम्मत कर्म क्या हैं और अनैतिकता क्या है यही अथर्ववेद का मुख्य आधार है सामाजिक वर्जनाओं का भी वर्णन अथर्ववेद में विस्तार से दिया गया है। राजा और प्रजा के कार्य क्षेत्र और कर्त्तव्यों का उल्लेख है। एक शासक के अपनी प्रजा के प्रति क्या दायित्व होते  हैं, उसे अपनी प्रजा के सुख, समृद्धि, रक्षा के लिए क्या करना चाहिए। यह सब वर्णन अथर्ववेद में दिया गया है। एक नागारिक के अपने परिवार और राष्ट्र के प्रति कर्तव्य और उत्तरदायित्व तथा उसके अधिकार का वर्णन इस वेद में हैं। शासक और प्रजा के आपासी व्यवहार को भी बहुत अच्छे से समझाया गया है। एक व्यक्ति का पितृऋण और देवऋण क्या होता है और इन ऋणों से कैसे उऋण होते हैं, उऋण होगा क्यों आवाश्यक हैं व्यक्ति की जीविका के कार्यों, कृषि, व्यपार, आयुधजीवन , सेवाकर्म किसे और किस रीति से करना है इसकी जानकारी अथर्ववेद में हैं। इस प्रकार अथर्ववेद में जीवन जीने की कला सिखाई गई है

अथर्ववेद का उपवेद स्थापत्य वेद है। स्थापत्य शब्द स्थापना से बना है। स्थापना का अर्थ है स्थिर करना या उचित जगह पर रखना। इस वेद में मुख्य रूप से भवन निर्माण, नगर नियोजन मंदिर प्रासाद, जलकुण्ड आदि की शास्त्रोक्त निर्माण विधियाँ दी गई हैं। इसी के  अंतर्गत यान, मुर्तिकला और चित्रकला के बारे में सम्पूर्ण वर्णन है। बैठने और सोने के साधान अर्थात् फर्नीचर की निर्माण विधि भी इसी वेद में दी गई है अथर्ववेद में ज्योतिष का सबसे अधिक एंव विस्तारित स्वरूप मिलता है। इस वेद में ज्योतिष विधा अपने सर्वश्रेष्ठ रूप में प्रतिपादित की गई। इस वेदमें ज्योतिष संबंधी करीब एक सौ बासठ कारिकायें मिलती है जिससे ज्योतिष एक संपूर्ण शास्त्र के रूप में प्रचलित हुआ। वेदांग ज्योतिष वैदिकाकाल के अंत तक अत्यंत विकसित हो चुका था। इस समय तक भारत में सप्ताह के सात दिनों का नामकरण और उनसे संबद्ध ग्रहों का प्रचलन आदि हो चुका था।

 

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